सोमवार, 15 जून 2009

गजल ; मंज़र लखनवी

चाशनी को जबान में रखा
इत्र ही इत्रदान में रखा।


आपको जिसने ध्यान में रखा
ख़ुद को दारुल अमान में रखा।

धूप में रह के मैंने गज़लों को

फिक्र के सायबान में रखा।

तब्सरा जब किसी पे मैंने किया

आईना दरमियान में रखा।



मेरे माँ-बाप की दुआओं ने
मुझको अपनी अमान में रखा ।


जो कहा दिल ने वो किया मैंने
ये परिंदा उड़ान में रखा।


नाम तेरा न आए गज़लों में
ये सदा मैंने ध्यान में रखा।


तुझको मैंने छुपा के दुनिया से
अपने दिल के मकान में रखा।

तू सादा लौही मेरी थी
दुश्मन को अपने ही तर्जुमान में रखा।


जब भी मैंने गजल कही 'मंज़र'
दिल की बातों को ध्यान में रखा।

गुरुवार, 11 जून 2009

गजल ; ज्योति शेखर

राजा की मर्जी से आज मुनादी है
भूखे-नंगों का जश्ने-आजादी है।

आख़िर कुछ गूंगे लोगों ने मिलजुल कर
बहरों के दर पर आवाज उठा दी है।

हैं बदशक्ल स्वयंवर के सब भागीदार
किसको चुने ? बहुत बेबस शहजादी है।

इक-इक मण्डी है सब राजधानियों में
महँगी बिकती जिसमें उजली खादी है।

है जवाबदेही किसकी इन प्रश्नों की
यार सदन में प्रश्न यही बुनियादी है।

गुरुवार, 28 मई 2009

Fwd: niwedan




कविता  :  अलका मिश्रा  

जिन्दगी जीने की
कला सिखाना 
भूल गये मुझे
मेरे बुजुर्ग !
     मैंने देखा 
     लोगो ने बिछाए फूल 
     मेरी राहों में,
     प्रफुल्लित थी मैं !
     पहला कदम रखते ही 
     फूलों के नीचे 
     दहकते शोले मिले,
     कदम वापस खींचना 
     मेरे स्वाभिमान को गंवारा नहीं था;
     इस कदम ने
     खींच दी तस्वीर यथार्थ की ,
      दे दी ऎसी शक्ति 
      मेरी आँखों में 
      जो अब देख लेती हैं 
      परदे के पीछे का 'सच' .
हर कदम पर
लगता है
आ गया चक्रव्यूह का सातवाँ द्वार
जिसे नहीं सिखाया तोड़ना
मेरे बुजुर्गों ने मुझे
और मैं
हार जाउंगी अब !
किन्तु
वाह रे स्वाभिमान
जो हिम्मत नहीं हारता 
जो नहीं स्वीकारता 
कि मैं चक्रव्यूह में फंसी 
' अभिमन्यु ' हूँ 
जिस पर वार करते हुए 
सातों महारथी 
भूल जायेंगे युद्ध का धर्म .
      एक बार पुनः 
      ललकारने लगता है 
      मेरे अन्दर का कृष्ण , मुझे
      कि उठो ,
      युद्ध करो !
      और जीत लो 
      जिन्दगी का महाभारत .
पुनः 
आँखों में ज्वाला भरे 
आगे बढ़ते कदमों के साथ 
सोचती हूँ मैं 
कि
जिन्दगी जीने की 
कला सिखाना
भूल गये मुझे 
मेरे बुजुर्ग !     
 
               


गज़ल ,के के सिंह ,मयंक

ऐसे पल का करो कयास
जिसमें न हो कोई भी दास

इश्को - मुहब्बत प्यार वफा
कब मुफलिस को आते रास

आओ मुझसे ले लो सीख
कहता है सबसे इतिहास

जिससे देश की हो पहचान
पहनेंगे हम वही लिबास

भीड़ को देख के लगता है
महलों से बेहतर वनवास

खारे जल का दरिया हूँ
कौन बुझाए मेरी प्यास

छत पर देख के उनको 'मयंक'
चाँद का होता है आभास ।

बुधवार, 27 मई 2009

गजल , ज्योति शेखर ,उ.प्र

अब यहाँ पर कोई घर ऐसा नहीं है
हादसों के डर से जो सहमा नहीं है

आज फ़िर दंगा हुआ और उसका बेटा
अब तलक स्कूल से लौटा नहीं है ।

तुम कमीशन -जांच सब कुछ भूल जाते
तुमने नरसंहार को देखा नहीं है।

सब कहें ये हादसा ऐसे हुआ है
वो कहें ऐसा नहीं वैसा नहीं है।

उफ़ ये दिल है या अंधेरे बंद कमरे
कोई खिड़की कोई दरवाजा नहीं है।

सर से चुनर हाथ से बिछडे खिलौने
जिनका वहशत से कोई रिश्ता नहीं है।

देखकर माँ की नजर में सर्द दहशत
एक बच्चा देर से रोया नहीं है।

उजले भाषण -खाकी डंडे ,रंग ही रंग हैं
और बहता लाल रंग रुकता नहीं है।

किन फरिश्तों ने उसे कल बरगलाया
वो पडोसी तो मेरा ऐसा नहीं है।

मंगलवार, 26 मई 2009

ग़जल,राजेन्द्र तिवारी

मेरी खामोशियों में भी फ़साना ढूँढ लेती है

बड़ी शातिर है ये दुनिया बहाना ढूढ़ लेती है

हकीकत जिद किए बैठी है चकनाचूर करने को

मगर हर आँख फ़िर सपना सुहाना ढूढ़ लेती है।

उठाती है जो ख़तरा हर कदम पर डूब जाने का

वही कोशिश समंदर में खजाना ढूढ़ लेती है ।

कमाई है न चिडिया की न कारोबार है कोई

वो केवल हौसले से आबो-दाना ढूढ़ लेती है ।

ये दुनिया मस्लहत 'मंसूर'की समझी नहीं अब तक

सलीबों पर जो हंसना-मुस्कुराना ढूढ़ लेती है ।

जुनूं मंजिल का राहों में बचाता है भटकने से

मेरी दीवानगी अपना ठिकाना ढूढ़ लेती है ।

ग़ज़ल ,सत्य प्रकाश शर्मा

बहस को करते हो क्यों इस कदर तवील मियाँ
हर एक बात की होती नहीं दलील मियाँ

अजब ये दौर है सब फाख्ता उडाते हैं
नहीं तो काम ये करते थे बस खलील मियाँ

हमें ये डर नहीं ,इज्ज़त मिले या रुसवाई
ये फिक्र है कि न एहसास हो जलील मियाँ

हुजूम तश्नालबों का है हर तरफ , लेकिन
दिखाई देती नहीं एक भी सबील मियाँ

सफ़ेद झूठ से सच हार जायेगा, तय है
बशर्ते ढूँढ लो शातिर कोई वकील मियाँ

हमारे जिस्म पे बेशक कोई खरोंच नहीं
हमारी रूह पे हैं बेशुमार नील मियाँ।

सोमवार, 11 मई 2009

ग़ज़ल: अंसार कम्बरी

धूप का जंगल , नंगे पांवों , एक बंजारा करता क्या
रेत के दरिया , रेत के झरने , प्यास का मारा करता क्या


बादल-बादल आग लगी थी , छाया तरसे छाया को
पत्ता-पत्ता सूख चुका था, पेड़ बेचारा करता क्या

सब उसके आँगन में अपनी राम कहानी कहते थे
बोल नहीं सकता था कुछ भी घर चौबारा करता क्या

तुमने चाहे चाँद-सितारे ,हमको मोती लाने थे
हम दोनों की राह अलग थी साथ तुम्हारा करता क्या

ये न तेरी और न मेरी ,दुनिया आनी-जानी है
तेरा - मेरा, इसका-उसका फ़िर बँटवारा करता क्या

टूट गये जब बंधन सारे और किनारे छूट गये
बीच भंवर में मैंने उसका नाम पुकारा ,करता क्या

ग़ज़ल ; राजेन्द्र तिवारी ,कानपुर

बिना लफ्जों का कोई कोई ख़त पढा क्या ?
मुहब्बत से , कभी पाला पडा क्या ?

अगर तुम प्यार का मतलब न समझे

तो सारी जिन्दगी तुमने पढा क्या ?


हमारा नाम है सबकी जबाँ पर

नया किस्सा ज़माने ने गढा क्या ?

अनहलक़ की सदायें गूँजती है
कोई मंसूर सूली पर चढ़ा क्या ?
ज़बानों से सफर तय हो रहा है
किसी का पाँव रस्ते पर बढ़ा क्या ?
कलम की बात है कद है कलम का
कलम वालों में फ़िर छोटा -बड़ा क्या ?
उसे हम आदमी समझे थे, लेकिन
वो सचमुच हो गया चिकना घडा क्या ?

तुम उसके नाम पर क्यों लड़ रहे हो
कभी अल्लाह , ईश्वर से लड़ा क्या ?





ग़ज़ल ; सत्य प्रकाश शर्मा

दूर कितने ,करीब कितने हैं

क्या बताएं रकीब कितने हैं


ये है फेहरिस्त जाँनिसारों की

तुम बताओ सलीब कितने हैं


तीरगी से तो दूर हैं लेकिन

रौशनी के करीब कितने हैं


कोई दिलकश सदा नहीं आती

कैद में अंदलीब कितने हैं


मैकशी पर बयान देना है

होश वाले अदीब कितने हैं


जिसको चाहें उसी से दूर रहें

ये सितम भी अजीब कितने हैं


अपनी खातिर नहीं कोई लम्हा

हम भी आख़िर गरीब कितने हैं

ग़ज़ल ; अंसार कम्बरी

किसी के ख़त का बहुत इन्तेज़ार करते हैं
हमारी छत पे कबूतर नहीं उतरते हैं


खुशी के , प्यार के , गुल के ,बहार के लम्हे
हमें मिले भी तो पल भर नहीं ठहरते हैं।
किसी तरफ से भी आओगे , हमको पाओगे
हमारे घर से सभी रास्ते गुज़रते हैं ।
ये जानता है समंदर में कूदने वाला
जो डूबते हैं , वही लोग फ़िर उभरते हैं।
कहीं फसाद , कहीं हादसा , कहीं दहशत
घरों से लोग निकलते हुए भी डरते हैं।

गुरुवार, 7 मई 2009

गजल ; सत्य प्रकाश शर्मा , कानपुर

सदियों की रवायत है जो बेकार न कर दें
दीवाने ,कहीं मरने से, इनकार न कर दें

इल्जाम न आ जाए कोई मेरी अना पर
एहबाब मेरा रास्ता हमवार न कर दें

इस खौफ से उठने नहीं देता वो कोई सर
हम ख्वाहिशें अपनी कहीं मीनार न कर दें

मुश्किल से बचाई है ये एहसास की दुनिया
इस दौर के रिश्ते इसे बाज़ार न कर दें

यह सोच के नजरें वो मिलाता ही नहीं है
आँखें कहीं जज्बात का इज़हार न कर दें

गजल ; अंसार कम्बरी ,कानपुर

आप कहते हैं दूषित है वातावरण
पहले देखें स्वयं अपना अंतःकरण

कितना संदिग्ध है आपका आचरण
रात इसकी शरण , प्रात उसकी शरण


आप सोते हैं सत्ता की मदिरा पिये
चाहते हैं कि होता रहे जागरण


फूल भी हैं यहाँ , शूल भी हैं यहाँ
देखना है कहाँ पर धरोगे चरण


आप सूरज को मुट्ठी में दाबे हुये
कर रहे हैं उजालों का पंजीकरण


शब्द हमको मिले ,अर्थ वो ले गये
न इधर व्याकरण, न उधर व्याकरण


लीक पर हम भी चलते मगर कम्बरी
कौन है ऐसा जिसका करें अनुसरण

गजल-- राजेन्द्र तिवारी, कानपुर

मंजिल पे पहुँचने का इरादा नहीं बदला
घबराए तो लेकिन कभी रस्ता नहीं बदला

गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं यहाँ लोग
हमने तो कभी खेल में पाला नहीं बदला

है चाँद वही, चाँद की तासीर वही है
सूरज से जो मिलता है उजाला, नहीं बदला

कहते हैं अजी आप जमाने को बुरा क्यों
हम आप ही बदले हैं, जमाना नहीं बदला

खुदगर्जी में तब्दील हुए हैं सभी रिश्ते
है एक मुहब्बत का जो रिश्ता, नहीं बदला

बांहों में रहा चाँद हमारी ये सही है
किस्मत का मगर अपनी सितारा नहीं बदला

लफ्जों को बरतने का हुनर सीख रहा हूँ
लफ्फाजी नहीं की है तो लहजा नहीं बदला

कहते हैं मेरे चाहने वाले यही अक्सर
राजेन्द्र है वैसा ही, जरा सा नहीं बदला

मंगलवार, 5 मई 2009

गीत ; सर्वत ज़माल

हम में बस यह अनुशासन है
चलते ही रहना जीवन है
तेज़ हवाएं क्या होती हैं
गर्म शिलाएं क्या होती हैं

वह क्या छान सकेंगे जंगल
जिनके पाँव तले है मखमल
हमसे पूछो जीवन गाथा
दंत कथाएं क्या होती हैं

पछुआ या पुरवाई कैसी
मरने में कठिनाई कैसी
चिंता ही इस युग में विष है
विष - कन्याएं क्या होती हैं

हक - अधिकार जताना सीखो
अब हथियार उठाना सीखो
हाथ बढाकर छीनो रोटी
मर्यादाएं क्या होती हैं ?

सोमवार, 4 मई 2009

ग़ज़ल -के० के० सिंह मयंक

आपका ये फरमाना झूठ
मुझसे है याराना , झूठ
दुनिया झूठ , जमाना झूठ
जग का ताना -बना झूठ
सच का साथ न हम छोडेंगे
बोले लाख जमाना झूठ
सुन के हकीक़त प्यार से बोले
प्यार का है अफसाना जूठ
मुल्क में हरसू खुशहाली है
खूब है ये शाहाना झूठ
ये तो काम है फरजानों का
क्या जाने दीवाना झूठ
मैंखारों से बोल रहा है
क्यों मीरे मैखाना झूठ
ऐ मयंक मरते मर जाना
होंठो पर मत लाना झूठ।




शनिवार, 2 मई 2009

गीत ; सर्वत जमाल
धुंध और कुहरे से
आँखें बेहाल हैं
बेपनाह कचरे से .

नियमों के पालन में
यहाँ-वहां ढील है
चूजों की रक्षा को
प्रहरी अब चील है
राजा से मंत्री से
खौफ नहीं अब कोई
जनता को ख़तरा है
अब केवल मुहरे से .

पछुआ के झोंके से
होंट फटे जाते हैं
फर्नीचर बनने को
पेड़ कटे जाते हैं
नदियों में पानी का
तल नीचे आ पहुंचा
सागर भी लगते हैं
अब ठहरे -ठहरे से.

शुक्रवार, 1 मई 2009

कविता ;इष्ट देव सांकृत्यायन ,
पूरब से
आती है
या
 आती है
पश्चिम से
एक किरण
सूरज की
दिखती है
इन आँखों में
 
मैं संकल्पित
जान्हवी से
कन्धों पर है
काँवर
आना चाहो
तो
आ जाना
तुम स्वयं 
विवर्त से बाहर 
 
तुमको ढूँढू
मंजरियों में 
तो
पाऊँ शाखों में
इन आँखों में 
 
सपने जैसा 
शील तुम्हारा 
और ख्यालों सा 
रूप
पानी जीने वाली 
मछली ही
पी  पाती है
धूप
 
तुम तो 
बस तुम ही हो
किंचित उपमेय नहीं
कैसे गिन लूँ
तुमको
मैं लाखों में 
इन आँखों में.   

गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

२ गजलें

मंज़रुल हक 'मंजर' लखनवी
अ-८, गांधीनगर, खुर्रमनगर,
पिकनिक स्पॉट रोड, लखनऊ-२२६०२२

वक्त की धूप में झुलसे हैं बहुत
उतरे उतरे से जो चेहरे हैं बहुत

खौफ ने पांव पसारे हैं बहुत
सहमे सहमे हुए बच्चे हैं बहुत

इतनी मासूम है गुलशन की फिजा
साँस लेने में भी खतरे हैं बहुत

बेशकीमत हैं ये किरदार के फूल
जिंदगी भर जो महकते हैं बहुत

लुत्फ़ जीने में नहीं है कोई
लोग जीने को तो जीते हैं बहुत

मुत्तहिद हो गये पत्थर सारे
और आईने अकेले हैं बहुत

जो बुजुर्गों ने किए हैं रोशन
उन चिरागों में उजाले हैं बहुत

सब्र के घूँट बहुत तल्ख सही
फल मगर सब्र के मीठे हैं बहुत

सीख लो फूलों से जीना 'मंजर'
रह के काँटों में भी हँसते हैं बहुत
************************

तडपे, नाचे, रोए, गाए
दिल हर सांचे में ढल जाए

नाच हमें तिगनी का नचाए
किस्मत क्या क्या खेल दिखाए

खोलूँ जबां तो मेरी जबां पर
कैसे तेरा नाम न आए

आइना बनकर जीना जो चाहा
दुनिया ने पत्थर बरसाए

ऐसा जीना भी क्या जीना
अपनी धूप न अपने साए

इश्क-ओ-मुहब्बत के नगमे अब
कौन सुने और कौन सुनाए

लम्बी तान के सोने वाले
वक्त का पंछी उड़ता जाए

हम भी फूल हैं इस गुलशन के
हम से कोई खार न खाए

फिकरे - जहाँ सब छोड़ के 'मंजर'
अपनी धुन में गाता जाए

सोमवार, 27 अप्रैल 2009

गजल * राम प्रकाश 'बेखुद'

खूबियों को देखते हैं खामियां गिनते नहीं
आम खाने से है मतलब, गुठलियाँ गिनते नहीं

अपने अपने जिस्म की चोटों का रखते हैं हिसाब
हम कुचल देते हैं कितनी चींटियाँ, गिनते नहीं

सर पे इक मजदूर के ईंटें तो गिनते हैं मगर
जिस्म में कितनी हैं उसके हड्डियाँ, गिनते नहीं

जो खुदा कर दे अता रहते हैं उसमें मुत्म इन
अपने दस्तरख्वान की हम रोटियां गिनते नहीं

हो अगर गाढे पसीने की कमाई तो गिनें
मुफ्त में मिलती हैं जिनको गड्डियां, गिनते नहीं

रास्ता बाहर निकल जाने का करते हैं तलाश
बैठे बैठे हम कफस की तीलियाँ गिनते नहीं

अपने हक में उठने वाले हाथ गिनते हैं मगर
उठ रही हैं हम पे कितनी उँगलियाँ, गिनते नहीं

गजल * राम प्रकाश 'बेखुद'

न वो जबान की शोखी मेरे बयान में है
न अब वो हुस्ने समाअत किसी के कान में है

बदल न दे वो कहीं रुख तेरे सफीने का
वो मुख्तसर सा जो सूराख बादबान में है

ये कहके वार दुबारा किया है कातिल ने
जरा सी जान अभी इस लहूलुहान में है

मेरी पसंद की गुडिया नजर नहीं आती
सुना हर एक खिलौना तेरी दुकान में है

न जाने कैसे वो दिन काटता है बारिश में
वो जिस गरीब का घर दोस्तों ढलान में है

रहे वफा पे मेरे सिर्फ़ नक्शे पा ही नहीं
मेरा लहू भी मेरे पांव के निशान में है

न जाने कौन सी आंधी बिखेर दे बेखुद
हर एक शख्स यहाँ रेत के मकान में है

रविवार, 26 अप्रैल 2009

ग़ज़ल ;रमेश नारायण सक्सेना 'गुलशन बरेलवी' [उ.प्र.]

दोस्तों को छू लिया है दुश्मनों को छू लिया
किस्सा-ऐ -गम ने मेरे, सबके दिलों को छू लिया
घर के आँगन के शज़र ने जब फलों को छू लिया
गाँव के कुछ बालकों ने पत्थरों को छू लिया
क्या गुज़रती है दिलों पर उनसे यह पूछे कोई
मौत ने भूले से भी जिनके घरों को छू लिया
अज्म मुहकम हो अगर तो कुछ भी नामुमकिन नहीं
आबलापाई ने मेरी मंजिलों को छू लिया
ऐसा लगता है गये दिन फ़िर पलट कर आ गए
क्या मेरी ग़ज़लों ने फ़िर उनके लबों को छू लिया
कुर्बतें जब मांगने पर भी न हो पाई नसीब
हमने भी थक हार कर फ़िर मैकदों को छू लिया
दैर ही में उस को पाया और न काबे ही में जब
हम फकीरों ने बयाबाँ रास्तों को छू लिया
हम को उन में भी खुदा का अक्स आया है नजर
आस्था से हम ने गुलशन जिन बुतों को छू लिया।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

ग़ज़ल -एहसास मगहरी ,मगहर [उ.प्र.]

जो बात तुममें  थी  वो  बात  कहाँ  है
 पहले की तरह रस्मे मुलाकात कहाँ है.
          मायूसियों ने लूट लिया प्यार का वजूद
          अब मेरे मुकद्दर में   तेरी जात  कहाँ है.
भूले   से   तेरी याद मुझे  आती नहीं  है
वो प्यार,वो उल्फत,वही ज़ज्बात कहाँ है.
          जब हुस्न ही है इश्क  के आदाब से खमोश
         उल्फत में बता इश्क की अब मात कहाँ है.
एहसास तो मोमिन है मगर मुझको बता आज
तूफ़ान       बदामा    वो   तेरी   जात   कहाँ  है.
कवित्त ; भाषा अवधी
अरविन्द कुमार झा ,लखनऊ [उ.प्र.]
चली बात हमरी तौ,हमहू ई बोलि उठे
बातन मां जितिहौ न ,तुम तौ हौ बउआ .
           हमते न उडौ,लदौ-भिदौ जाय अतै  अब 
           छोटे ते पेंच हम,    लडावा  कनकउआ .
मुर्गा,तीतर, बटेर ,खूब हम ,लडावा है,                
खावा रेवडी, आम झउवन पे  झउआ.
             अदब ,लिहाज़ हमरे बाप  की बपौती है
             हमते करौ दोस्ती, हम हन लखनउआ.  

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

घनाक्षरी ; 'नवाब' शाहाबादी ,लखनऊ  [उ.प्र.]
पीने या पिलाने को या मधुशाला जाने को भी,जब से किया है मैंने, आखिरी सलाम है
गली-गली कूचे-कुचे, लोग बार-बार पूछें, सचमुच पिए बिना कैसे कटे शाम है 
सच-सच बात यह पंथ मैंने सही चुना,जाहिद कि सीख पर किया नेक काम है
फिर भी न जाने लोग, कथन न माने लोग,सारे लखनऊ में नवाब बदनाम है.
 
जीवन है एक डार जिसमें है फूल-खार,कंटक चुभे तो कभी फूलों की जमात है 
कभी है शिशिर यह तो कभी बसंत बने,कभी नव पल्लव तो कभी गिरा पात है
कभी अनुकूल तो ये कभी प्रतिकूल लगे,शिशिर की धूप कभी पावस की रात है
सुख भी तो दुःख ही है जिसने ये जान लिया, जीवन उसी का प्रिय हुआ जलजात है?
 
शारदे की ऐसी कुछ कृपा हुई मुझ पर, रचने में लगा मैं भी नित्य नए गीत हूँ
शब्द-शक्ति उसकी है वाणी भी उसी की मित्र,फिर भी मनीषियों के बीच भयभीत हूँ
मनहर छंद का यह प्रथम प्रयास मेरा, ग़ज़ल रूबाई के मैं आज विपरीत हूँ
वर्णिक है छंद यह सुन लो नवाब तुम ,अच्छा हूँ या बुरा हूँ तुम्हारा मनमीत हूँ.
 
गोमती के तट पर बसा हुआ ये नगर, कवि सिरमौर और सिद्ध सरताज है
यहीं के सरस भी हैं यहीं के विकल जी हैं, मीर तकी मीर और अपना मजाज है
कहने को यूं तो प्रिय कई एक संगठन ,लेकिन दिलों में यहाँ 'चेतना' का राज है
जब-जब कोई कवि पढ़े यहाँ गीत छंद ,प्रमुदित होता सर्जकों का यह समाज है. 
   

घनाक्षरी ;जगदीश शुक्ल लखनऊ [उ.प्र.]

पुत्र प्राप्ति के प्रयास में जहाँ पे कई-कई ,पैदा हुई वहां तो विवाद बनी बेटियाँ
पुत्री में स्वरूप विंध्यवासिनी का दिखा जिन्हें ,वहां श्रद्धा-सुमन-प्रसाद बनी बेटियाँ
बड़े-बड़े कारनामे करके दिखाने लगीं ,छाप दाल युग हेतु याद बनी बेटियाँ
पिता को मुखाग्नि तक देने का निभा के धर्म,तोड़ के मिथक अपवाद बनी बेटियाँ।

बेटों संग पली-बढ़ी ,खेली-कूदी,बड़ी हुई ,पढ़-लिख कर शौर्यवान बनी बेटियाँ
गायन व वादन सी ललित कलाएं सीख,गृहकार्य दक्ष गुणवान बनी बेटियाँ
माता-पिता के लिए वे सबल सहारा बनी,सच्ची सेवा-धर्म का प्रमाण बनी बेटियाँ
धरती -गगन को भुजाओं में समेट कर ,सिन्धु नापने का अभियान बनी बेटियाँ।

व्याकुलता व्याप्त हुई चिंता की लकीरें खिंची ,जिन माता-पिता की सयानी हुई बेटियाँ
उन पर नज़रों के पहरे बिठाए गए ,कुल की प्रतिष्ठा की निशानी हुई बेटियाँ
ऊंचनीच जीवन का समझाया जाने लगा,परिवार की विचित्र प्राणी हुई बेटियाँ
वर मिला ब्याही गयीं,दोनों परिवारों बीच,स्नेह-संपदा की राजधानी हुई बेटियाँ।

नाज-नखरे सभी उठाते रहे माता-पिता ,पलको पे सदा ही बिठाई गई बेटियाँ
पाली और पोषी गई बड़े ही जतन से वे ,सुघर व निपुण बनाई गई बेटियाँ
पेट काट-काट कर दान व दहेज़ दे के ,नयनों से दूर भी बसाई गई बेटियाँ
किंतु जहाँ-जहाँ मिले लालची व फरेबी लोग, वहाँ-वहाँ घरों में जलाई गई बेटियाँ।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

ग़ज़ल के. के. सिंह 'मयंक'

मुखालिफ दौरे हाज़िर की हवा है
चिरागे जीस्त फिर भी जल रहा है

जिन्हें औकात का मतलब सिखाया
वो कहते हैं तेरी औकात क्या है

न हल होगा कभी तुमसे ये वाइज़
निगाहो दिल का हजरत मस-अ-ला है

करम फरमाइए हम पर भी इक दिन
जहाँ वालो! हमारा भी खुदा है

है लहजा तो बहुत ही सख्त उसका
मगर वह आदमी दिल का भला है

मुझे कहती है क्यों दीवाना दुनिया
कोई बतलाओ मुझको क्या हुआ है

उसूलों की न कीजे बात हमसे
मुहब्बत जंग में सब कुछ रवा है

कहाँ ले आई है मुझको मुहब्बत
कोई हमदम न कोई हमनवा है

वो दिल लेकर करेगा बेवफाई
मयंक इतना तो हमको भी पता है

सोमवार, 13 अप्रैल 2009

ग़ज़ल -- नफीस गाजीपुरी

नींद आँखों में आज कम कम है
फिर वही रतजगों का मौसम है
दोस्ती, दिलदही, वफादारी
इन चिरागों की लौ भी मद्धम है
फूल मुरझा रहे हैं आरिज़ के
मेरी आँखों में थोड़ी शबनम है
कौन उठ कर गया है सहरा से
क्यों गज़ालों की आँख पुरनम है
जुल्फ-ए-हस्ती संवर न पायेगी
जुल्फ-ए-गेती बहुत ही बरहम है
दिन गुजरने तो दो कुछ और नफीस
वक्त सुनते हैं खुद भी मरहम है

शनिवार, 11 अप्रैल 2009

कवित्त : अरविन्द कुमार झा ,ऐशबाग ,लखनऊ[उ.प्र.]

एक नव वधू जब पति से ही पूछ बैठी
जीवन की निज कुछ बातें भी बतायेंगे ।
पति बोले अच्छा लगे या कि लगे तुम्हे बुरा
हम थे आवारा ये न आप से छिपाएंगे ।
प्रश्न अब पत्नी से किया है पतिदेव ने कि
शादी पूर्व आपने किया है क्या, बतायेंगे?
बोली फिर पत्नी कैसी पूछ-ताछ है ये अब
कहिये क्या शादी बाद कुंडली मिलायेंगे॥

ग़ज़ल ;भोलानाथ 'अधीर' प्रतापगढ़ ,[उ.प्र.]

मेरा हमराज वही मेरे मुकाबिल भी वही
मेरा रखवाला वही है मेरा कातिल भी वही
जिसने खतरे से खबरदार किया था मुझको
मेरी बर्बादी के आमाल में शामिल भी वही
मैंने जिसके लिए दरवाजे सभी बंद किए
क्या पता मेरे दिल में था दाखिल भी वही
छोड़कर गैर की महफ़िल मैं चला आया यहाँ
है यहाँ वैसा ही माहौल यह महफ़िल भी वही
सच तो यह है कि ' अधीर ' इस से रहा नावाकिफ
मेरा रस्ता भी वही है मेरी मंजिल भी वही ।

गीत ; संकटा पसाद श्रीवास्तवा 'बंधू श्री' करनैलगंज[उ.प्र.]

जाने क्यों हम खींच रहे हैं ,रोज लकीरें पानी पर
मुझको आती लाज आज है खुशबूदार जवानी पर।
रोज पालते घाव ह्रदय में,
और उन्हें सहलाते हैं
झूठ-सांच की मरहम पट्टी
से मन को बहलाते हैं
वंशज हैं राणा प्रताप के
और शिवाजी के शागिर्द

दाग लगाकर बैठ गये हम, वीरों की कुर्बानी पर
आती मुझको ----------------------------।
पीट-पीट कर ढोल सड़क पर
करते ता-ता-थैया रोज
डुबो रहे गांधी ,सुभाष औ
शेखर वाली नैया रोज
कभी अहिंसा,कभी शान्ति
तो कभी निपट भाई-चारा
सोच-सोच कर तंग आ चुके ,अपनी इस नादानी पर
आती मुझको------------------------------।
भले तिरंगा लहरायें हम
अम्बर की ऊंचाई तक
पटी न मुझसे छप्पन वर्षों
में कटुता की खाई तक
माना मेरी सैन्य -शक्ति से
सारा जग थर्राता है
फिर भी करते म्याऊँ -म्याऊँ चूहे की मनमानी पर
आती मुझको-------------------------------.

ग़ज़ल:के० के० सिंह मयंक अकबराबादी [उ.प्र.]

गीत बिना सूना है साज
बोलो क्या है इसका राज।
दुनिया तक क्यों पहुंची बात
जब तू था मेरा हमराज।
जिसका हो अंजाम बुरा
कौन करे उसका आगाज़।
हर मोमिन का फ़र्ज़ यही है
पाँच वक्त की पढ़े नमाज़।
इश्क ने चलकर राहे वफा में
हुस्न को बख्शा है एजाज़।
उनकी बज्म में लेकर पहुँची
मुझको तखैयुल की परवाज़।
अपनी ग़ज़ल में लाओ मयंक
मीरो-गालिब के अंदाज़।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

गीत;विजय प्रसाद त्रिपाठी [उ.प्र.]

महँगा राशन शासन ढीला ,ठंडा चूल्हा रिक्त पतीला

अट्टहास कर रही गरीबी बनकर धनिया ,गोबर शीला,

प्रेम चंद्र के इन पात्रों की दशा देखी जाती है

स्वर्ण वर्ष में आकर लज्जा आजादी को आती है

क्षुधित ,तृषित उदरों अधरों को रोटी नहीं , पानी है

गिरी कोठरी टूटा छप्पर उनकी यही निशानी है

दींहीनता को युग-युग से परी कथा क्या भाती है

स्वर्ण वर्ष -------------------------------------------

कभी गरीबी यहाँ मिटाने जो भी आगे आया है

सदा अमीरी का तलवा जिन्ह्वा से सहलाया है

अहं भावना छद्म सांत्वना तृप्ति नहीं दे पाती है

स्वर्ण वर्ष--------------------------------------

अपने भ्रम सीकर की मसि से भाग्य देश का लिखता आया

बनकर श्रमिक कभी स्वजनों का उदर नहीं जो भर पाया

वोटों की सौदेबाजी में सुरा उसे दी जाती है

स्वर्ण वर्ष--------------------------------------

घर-घर ऋद्धि-सिद्धि का डेरा राष्ट्रवाद का नारा है

अपनी कुंठित संतानों से भारत हरदम हाराहाई

आज चाँद पर बैठ मनुजता देखो अश्रु भाती है

स्वर्ण वर्ष-------------------------------------------

जो दिल्ली ने दिया हमें वह जाति-पांति धो डाले हम

सड़ा घिनौना लोकतंत्र ,कर शोभित,उसे सजालें

छुआ -छूत का कोढ़ मलिन मन माता का कर जाती है

swarn वर्ष ----------------------------------------

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

`ग़ज़ल;एडवोकेट शरद मिश्रा ,लखनऊ,[उ.प्र.]

मन विवश हो क्रांति के उदगार गाता है
वक्त को भी अब यही अंदाज भाता है।

आग का विस्फोट अब रुकना असंभव है
धैर्य का अपना हिमालय डग मगाता है ।

मुस्कुराकर देख उसकी तरफ मत ऐसे
आसमाँ का चाँद भय से थरथराता है।

सभा चूहे करें कितनी भी मगर घंटी
कौन बिल्ली के गले में बाँध पाता है।

बात बिल्कुल झूठ हो पर अधर उनके हों
सच, हमारा हो भले,धोखा कहाता है ।

लट हटाना चाँद से कुछ जुल्म ऐसा है
जिन्दगी पर ज्यों फलक बिजली गिराता है।

मिल रहे जयचंद जाफर निकट मुकुटों के
अब मुझे 'गुजरा जमाना याद आता है।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

ग़ज़ल ;एहसास मगहरी ;मगहर ,[उ.प्र.]

हर एक को जहान में प्यारी है जिन्दगी
लेकिन अमल बगैर कुंवारी है जिन्दगी।

हो के दीवाना काट दी हमने तो जिन्दगी
कैसे कहूं अकेले हमारी है जिन्दगी।

ये है खुदा की चीज कि जब चाहे छीन ले
तेरी है जिन्दगी न ये मेरी है जिन्दगी।

जौरो-सितम के बाद भी दामन बचा लिया
हमने सदा वफा में गुजारी है जिन्दगी ।

यूं ही नहीं खिले हैं ये दिल में मेरे गुलाब
तप-तप के हमने गम में संवारी है जिन्दगी।

जिसके लिए ये फूल हो , हो फूल दोस्तों
एहसास के लिए तो कटारी है जिन्दगी।

ग़ज़ल ज्योति शेखर लखनऊ [उ.प्र.]

हमारे इस मरुस्थल को समंदर देने वाले थे
महल उनका कहाँ है जो हमें घर देने वाले थे।

धुंआ बारूद का पी-पी के अंधी हो गयीं आँखें
जिन्हें तुम अम्न का रंगीन मंजर देने वाले थे।

मरा फुटपाथ पर जो उसका इक वारिस नहीं निकला
सुना था आप फुटपाथों को बिस्तर देने वाले थे।

वो जिनके होठ चारण हैं कलम यशगान है साथी
हुकूमत के ये चातक क्रान्ति को स्वर देने वाले थे।

ये तुम हो जिनकी खातिर ये वतन बस एक कुर्सी है
वो हम थे जो वतन के वास्ते सर देने वाले थे।

वो सूरज थे जो ख़ुद डूबे सियासत के अंधेरे में
वो हर घर में खुशी की रौशनी भर देने वाले थे।

मंगलवार, 31 मार्च 2009

गीत- सर्वत jamal

मधुमासी दिन बीत चुके हैं
सुख के सागर रीत चके हैं
आज महाभारत से पहले
कौरव बाजी जीत चुके हैं
आँगन आँगन सन्नाटा है

दुखियारों की रात बड़ी थी
पैरों में ज़जीर पडी थी
दशरथ तो वर भूल चुके थे
कैकेयी की आँख गडी थी
पुरखों की गति सिखलाती है
धर्म निभाने में घाटा है
ताने बाने बिखरे बिखरे
सभी सयाने बिखरे बिखरे
जीवन ने वो रूप दिखाया
हम दीवाने बिखरे बिखरे
पहले मन में क्रांति बसी थी
अब तो दाल, नमक, आटा है.

शुक्रवार, 27 मार्च 2009

ग़ज़ल- सर्वत जमाल

गुलामी सब अभी तक ढो रहे हैं
और इस पर भी सभी खुश हो रहे हैं

घरों तक पैठ है दुश्मन की लेकिन
हमारे शहर में सब सो रहे हैं

बुलंदी, रौशनी, सम्मान, दौलत
ये सारे फायदे किस को रहे हैं

कटाई का समय सर पर खड़ा है
किसान अब खेत में क्या बो रहे हैं

दरिन्दे भी, किसी पल आदमी भी
यहाँ चेहरे सभी के दो रहे हैं

सुना है आप हैं बेदाग़ अब तक
तो दामन फिर भला क्यों धो रहे हैं

अभी तक रो रहे थे बंदिशों पर
अब आज़ादी का रोना रो रहे हैं

हमें छालों का दुखडा मत सुनाओ
सफर में साथ हम भी तो रहे हैं

अंधेरों ने किया दुनिया पे कब्जा
उजाले अपनी ताक़त खो रहे है

सोमवार, 23 मार्च 2009

गीत ; नवाब शाहाबादी , लखनऊ [उ.प्र.]

बगिया में अमवा भी महका पर
महुआ बदनाम हो गया !
चैता भी कम नहीं है मादक पर
फगुआ बदनाम हो गया !
खन-खन करते रहे रात भर
कंगन जोरा-जोरी में
छन-छन करती रही पयलिया
प्यार की कौरा -कौरी में
बिछुआ क्या ठुनका आंगन में
अखरा कानों में सबके
कंगना खनका, पायल छनकी पर
बिछुआ बदनाम हो गया !
पुरवाई ने आँखें नम की
पछुआ ने भी दर्द दिया
यादों को दोनों ने लाकर
मन घायल बेचैन किया
दोनों ने ही दर्द दिए हैं
क्या पछुआ क्या पुरवाई
पुरवाई सरनाम हो गयी पर
पछुआ बदनाम हो गया !
चले तो थे सब अगुवाई में
मंजिल भी थी एक मगर,
अपनी-अपनी मनमानी में
भटक गये सब इधर- उधर
मंजिल नहीं मिली जब इनको
दोष मढ़ दिया ध्वज वाहक पर,
दोषी तो थे चलने वाले पर
अगुआ बदनाम हो गया !
चैता भी कम नहीं है मादक,पर
फगुआ बदनाम हो गया !

गीत; सर्वत जमाल ,बस्ती [उ.प्र.]

निरंतर सांझ करे श्रृंगार
निशा ने पहना चंदन हार ।
तिमिर किरणों ने बांधे हाथ
उजाला असमंजस में है
धराशायी हैं आदमकद
सफलता किसके बस में है
ठगे से देख रहें हैं सब
प्रलय का पल-प्रतिपल विस्तार।
निरंतर ----------------------------
सदाशयता का यह अपमान
विदेशी ठप्पे फसलों पर
गडी हैं गैरों की आँखें
सुरक्षा तक के मसलों पर
सूना है आने वाले हैं
यहाँ आयातित व्रत-त्यौहार ।
निरंतर -----------------------------
अहिल्या आतंकित भयभीत
चकित हैं जनक-दुलारी आज
खडाऊ फेंकी घूरे पर
भरत ने पहना शाही ताज
निराली कलियुग की है रीति
दशानन लेता है अवतार।
निरंतर -------------------------------

ग़ज़ल ;अलका मिश्रा ,लखनऊ {उ.प्र.}

तुमने जब-जब देना चाहा मुझको अपना प्यार दिया
और वक्त पड़ने पर तुमने मुझको ही दुत्कार दिया।

जाने कैसी आग लगी थी आज हमारे सीने में
एक अकिंचन के चरणों पर अपना सब कुछ वार दिया।

क्या करने को पुण्य करें हम, इतने कष्ट सहें क्यूँ कर
सुनते हैं ईश्वर ने पापी रावण तक को तार दिया।

प्रेम, धैर्य , मर्यादा, ममता , करुणा, साहस , त्याग
तुमने इन नाजुक कंधों पर कैसा - कैसा भार दिया।

रविवार, 22 मार्च 2009

कविता ; अलका मिश्रा ,गोरखपुर, [उ.प्र.]

इस
धूप की नई रंगत ने
मजबूर कर दिया है अब
सोचने पर
कि
फिजां बदलने लगी है
अब बदलना चाहिए हमें
अपना भी तौर-तरीका
खान-पान
रहन-सहन
आदतें
और
रवायतें भी
वक्त ;
आ गया है।

आज अपने भाई के जन्म दिन पर उसे प्यार के साथ
क्योंकि मैं उससे बहुत दूर हूँ.



ग़ज़ल ; के.के.सिंह मयंक अकबराबादी ,लखनऊ [उ.प्र.]

हो गया है मुझ से हर इक जाना-पहचाना अलग
देखकर हालत मेरी तुम भी न हो जाना अलग।

शम्मा से रह नहीं सकता है जब परवाना अलग
कैसे रह सकता है तुझसे तेरा दीवाना अलग ।

इस कदर वीरानगी है मयकदे में इन दिनों
जाम से मीना अलग है खुम से पैमाना अलग।

आप इन महलों को लेकर जायेंगे आख़िर कहाँ
हम बना लेंगे चमन में अपना काशाना अलग।

यूं तो वाबस्ता हैं दोनों जिंदगानी से मगर
उनका अफ़साना अलग है मेरा अफ़साना अलग।

मैं पीया करता हूँ अक्सर चश्मे-साकी से शराब
और रिन्दों से है मेरा जौके रिन्दाना अलग ।

एक रब्ते ख़ास है पीरे-मुगा से ऐ मयंक
हम बना सकते हैं वरना अपना मयखाना अलग।
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