गुरुवार, 11 जून 2009

गजल ; ज्योति शेखर

राजा की मर्जी से आज मुनादी है
भूखे-नंगों का जश्ने-आजादी है।

आख़िर कुछ गूंगे लोगों ने मिलजुल कर
बहरों के दर पर आवाज उठा दी है।

हैं बदशक्ल स्वयंवर के सब भागीदार
किसको चुने ? बहुत बेबस शहजादी है।

इक-इक मण्डी है सब राजधानियों में
महँगी बिकती जिसमें उजली खादी है।

है जवाबदेही किसकी इन प्रश्नों की
यार सदन में प्रश्न यही बुनियादी है।

2 टिप्‍पणियां:

venus kesari ने कहा…

आख़िर कुछ गूंगे लोगों ने मिलजुल कर
बहरों के दर पर आवाज उठा दी है।

ये शेर ख़ास पसंद आया

वीनस केसरी

गर्दूं-गाफिल ने कहा…

राजा की मर्जी से आज मुनादी है
भूखे-नंगों का जश्ने-आजादी है।
हैं बदशक्ल स्वयंवर के सब भागीदार
किसको चुने ? बहुत बेबस शहजादी है।

लोकतंत्र की वर्तमान स्थिति पर धारदार तंज
चयनकर्ता को बधाई

अलकाजी
आप की साफगोई ने आपको और भी सम्माननीय बना दिया है .
मंजर साहब उस पीढी के शायर हैं जब तपस्या करनी पडती थी .उनके सद्भाव को मेरा प्रणाम
आपका पुनः आभार और अभिनन्दन
सरस्वती वरदानी सर्वत दंपत्ति को शुभ मंगल शुभकामनायें

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