गुरुवार, 7 मई 2009

गजल ; सत्य प्रकाश शर्मा , कानपुर

सदियों की रवायत है जो बेकार न कर दें
दीवाने ,कहीं मरने से, इनकार न कर दें

इल्जाम न आ जाए कोई मेरी अना पर
एहबाब मेरा रास्ता हमवार न कर दें

इस खौफ से उठने नहीं देता वो कोई सर
हम ख्वाहिशें अपनी कहीं मीनार न कर दें

मुश्किल से बचाई है ये एहसास की दुनिया
इस दौर के रिश्ते इसे बाज़ार न कर दें

यह सोच के नजरें वो मिलाता ही नहीं है
आँखें कहीं जज्बात का इज़हार न कर दें

2 टिप्‍पणियां:

venus kesari ने कहा…

सदियों की रवायत है जो बेकार न कर दें
दीवाने ,कहीं मरने से, इनकार न कर दें

बहुत बेहतरीन मतला है
गजल अच्छी लगी

अच्छे तेवर है
आपक वीनस केसरी

Gaurav Singh ने कहा…

bohot accha likha apne .

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