रविवार, 20 सितंबर 2009

गजल ; अंसार कंबरी ,कानपुर [उ. प्र.]

एक तरफा वहाँ फैसला हो गया
मैं बुरा हो गया ,वो भला हो गया

पूजते ही रहे हम जिसे उम्र भर
आज उसको भी हमसे गिला हो गया

जिस तरफ देखिये प्यास ही प्यास है
क्या हमारा शहर कर्बला हो गया

चाँद मेरी पहुँच से बहुत दूर था
आपसे भी वही फासला हो गया

एक साया मेरे साथ था कम्बरी
यूं लगा जैसे मैं काफिला हो गया ।

9 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

वाह जी, अंसार मंबरी जी को पढ़ कर बेहतरीन लगा. आपका आभार.

Apoorv ने कहा…

एक साया मेरे साथ था कम्बरी
यूं लगा जैसे मैं काफिला हो गया

मनभावन ग़ज़ल बाँटने के लिये शुक्रिया

Mithilesh dubey ने कहा…

वाह-वाह क्या बात है। लाजवाब अभिव्यक्ति। बहुत-बहुत बधाई........

संगीता पुरी ने कहा…

वाह बहुत बढिया !!

अर्शिया ने कहा…

आपकी पसंद वाकई लाजवाब है।
( Treasurer-S. T. )

अशोक मधुप ने कहा…

अंसार कंबरी की गजल पढवाने के लिए आभार ।एक शानदार गजल

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

एक साया मेरे साथ था कम्बरी
यूं लगा जैसे मैं काफिला हो गया

अंसार कंबरी जी की ये ग़ज़ल पढ़ कर धन्य हो गया.
आपको भी हार्दिक धन्यवाद कि आपने उनकी इस ग़ज़ल से हम लोगों को अवगत कराया.

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

आकांक्षा~Akanksha ने कहा…

Bahut khub Kambari saheb....accha likha apne.

Popular India ने कहा…

बहुत अच्छा
सुन्दर रचना

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