बुधवार, 27 जनवरी 2010

गजल - अरविन्द असर

अदालत तक कहाँ ये बात मेरे यार जाती है
कि अक्सर तर्क के आगे सचाई हार जाती है

वो अपने दौर की उपलब्धियां कुछ यूं गिनाते हैं
बड़े आराम से अब तो वहां तक कार जाती है

भले ऊपर ही ऊपर बेईमानी खूब फलती हो
मगर अंदर ही अंदर आदमी को मार जाती है

निभा पाया नहीं कोई इसे इक बार भी शायद
तिरंगे की कसम खाई मगर हर बार जाती है

वो अपराधीकरण पर बस यही इक बात कहते हैं
अगर उनकी न मानें तो मेरी सरकार जाती है

थपेड़े खाती रहती है मेरे विश्वास की नैया
कभी इस पार आती है, कभी उस पार जाती है

भला किस तरह पहुचेंगी वहां मजलूम की आहें
जहाँ तक सिर्फ पायल की 'असर' झंकार जाती है.

12 टिप्‍पणियां:

अरविन्द चतुर्वेदी Arvind Chaturvedi ने कहा…

उम्दा गज़ल.धन्यवाद्

मनोज कुमार ने कहा…

ग़ज़ल दिल को छू गई।
बेहद पसंद आई।

राज भाटिय़ा ने कहा…

भले ऊपर ही ऊपर बेईमानी खूब फलती हो
मगर अंदर ही अंदर आदमी को मार जाती है
सत्य वचन जी, बहुत सुंदर लगी अप की यह गजल
धन्यवाद

dipayan ने कहा…

सच को आईना दिखाती हुई बेहतरीन गज़ल।

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

मोहतरमा अलका साहिबा, आदाब
पूरा 'असर' कर गई अरविंद साहब की ग़ज़ल
अदालत तक कहाँ ये बात मेरे यार जाती है
कि अक्सर तर्क के आगे सचाई हार जाती है
बहुत खूबसूरत मतला है.

हर शेर दाद का हक़दार है
खास तौर पर ये शेर कितना प्यारा हुआ है-
थपेड़े खाती रहती है मेरे विश्वास की नैया
कभी इस पार आती है, कभी उस पार जाती है
और मक़ता. वाह-
भला किस तरह पहुचेंगी वहां मजलूम की आहें
जहाँ तक सिर्फ पायल की 'असर' झंकार जाती है.
असर साहब को लेखन और आपको संकलित करने के लिये
बहुत बहुत बधाई
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

अजय कुमार ने कहा…

बहुत ही शानदार और सामयिक गजल । जबरदस्त शेर ,खासकर ये-
वो अपराधीकरण पर बस यही इक बात कहते हैं
अगर उनकी न मानें तो मेरी सरकार जाती है

anand pandey ने कहा…

Kamaaaal! Bahaut hi saTeeK.

निर्मला कपिला ने कहा…

अदालत तक कहाँ ये बात मेरे यार जाती है
कि अक्सर तर्क के आगे सचाई हार जाती है

निभा पाया नहीं कोई इसे इक बार भी शायद
तिरंगे की कसम खाई मगर हर बार जाती है

भला किस तरह पहुचेंगी वहां मजलूम की आहें
जहाँ तक सिर्फ पायल की 'असर' झंकार जाती है
वाह कमाल की गज़ल है हर शेर उम्दा और भाव समाज और राजनीति का आईना हैं
अरविन्द असर जी को बहुत बहुत बधाई

सुलभ जायसवाल § सतरंगी ने कहा…

अरविन्द असर साहब की ग़ज़ल पसंद आयी..

भले ऊपर ही ऊपर बेईमानी खूब फलती हो
मगर अंदर ही अंदर आदमी को मार जाती है

डाकिया बाबू ने कहा…

Umda prastuti...wah..wah !!

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

भले ऊपर ही ऊपर बेईमानी खूब फलती हो
मगर अंदर ही अंदर आदमी को मार जाती है ।
वाह ! वाह !वाह !

Gaurav Singh ने कहा…

शब्दों को बड़ी ही खूबसूरती से पाया है, सभी भाव बखूबी व्यक्त हो रहे है ।

बोहोत ही खूबसूरत ग़ज़ल ।

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